UGC NEW RULES 2026 EXPLAINED

मुख्य अपडेट: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए 'उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम, 2026' (Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026) को लेकर देशभर में विवाद गहरा गया है। 15 जनवरी 2026 से प्रभावी इन नियमों को लेकर दिल्ली मुख्यालय से लेकर लखनऊ तक प्रदर्शन हो रहे हैं।

UGC का नया नियम 2026 क्या है?

यूजीसी ने इन नियमों को उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने और समानता बढ़ाने के लिए लागू किया है। नियमों के मुताबिक हर यूनिवर्सिटी और कॉलेज में एक इक्विटी कमेटी (Equity Committee) बनानी होगी। यह कमेटी एससी (SC), एसटी (ST) और ओबीसी (OBC) छात्रों की शिकायतें सुनेगी और तय समय में उनका निपटारा करेगी। कमेटी में इन वर्गों के साथ-साथ दिव्यांग और महिलाओं का होना भी अनिवार्य है।

नियमों के तहत शिक्षण संस्थानों को 'इक्वल अपॉर्चुनिटी सेंटर', 'इक्विटी स्क्वाड' और 24×7 हेल्पलाइन जैसी व्यवस्थाएं बनानी होंगी। यूजीसी का दावा है कि पिछले पांच वर्षों में इन वर्गों के खिलाफ भेदभाव की शिकायतों में 118.4% की बढ़ोतरी हुई है, जिसके कारण ये नियम जरूरी हो गए थे।

सवर्ण समाज और छात्र क्यों कर रहे हैं विरोध?

यूजीसी के नए नियमों के खिलाफ सवर्ण यानी जनरल कैटेगरी के छात्र भारी प्रदर्शन कर रहे हैं। उनका मुख्य आरोप है कि ये नियम एकतरफा हैं और केवल SC, ST और OBC के खिलाफ भेदभाव की बात करते हैं। जनरल कैटेगरी के छात्रों को भेदभाव का शिकार माना ही नहीं गया है।

विरोध के मुख्य बिंदु:

"मैं अभागा सवर्ण हूं, मेरा रोंया-रोंया उखाड़ लो राजा..." - कुमार विश्वास ने सोशल मीडिया पर इस नियम के प्रति अपनी नाराजगी व्यक्त की।

सुप्रीम कोर्ट में चुनौती: याचिकाकर्ता की दलीलें

एडवोकेट विनीत जिंदल और मृत्युंजय तिवारी द्वारा सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की गई हैं। याचिका में रेगुलेशन 3(c) को चुनौती दी गई है, जो जातिगत भेदभाव को केवल आरक्षित वर्गों के संदर्भ में परिभाषित करता है। याचिकाकर्ताओं की मांग है कि भेदभाव की परिभाषा 'Caste-Neutral' (जाति-निरपेक्ष) होनी चाहिए।

याचिका में कहा गया है कि भेदभाव की वर्तमान परिभाषा संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), 15(1) और 21 का उल्लंघन करती है। कोर्ट से मांग की गई है कि इन नियमों पर तत्काल रोक लगाई जाए या इन्हें संशोधित किया जाए।

सरकार और यूजीसी का आधिकारिक पक्ष

विवाद बढ़ने पर सरकारी सूत्रों ने स्पष्ट किया है कि सरकार बहुत जल्द इस मुद्दे पर तथ्यों के साथ स्पष्टीकरण जारी करेगी। सरकार का कहना है कि इन नियमों का दुरुपयोग किसी भी सूरत में नहीं होने दिया जाएगा और भ्रम फैलाने की कोशिशों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

यूजीसी के अनुसार, ये नियम सुप्रीम कोर्ट के पुराने निर्देशों के आधार पर तैयार किए गए हैं ताकि परिसरों को सुरक्षित बनाया जा सके। सरकार का जोर है कि ये नियम सभी छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों के लिए निष्पक्ष परिसर बनाने के उद्देश्य से हैं।

बरेली सिटी मजिस्ट्रेट का इस्तीफा

इस विवाद का असर प्रशासनिक स्तर पर भी दिखा है। बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने इन नियमों के विरोध में अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने इसे 'काला कानून' बताते हुए कहा कि यह सामान्य वर्ग के खिलाफ है और इससे ब्राह्मणों का उत्पीड़न बढ़ सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

Q1: क्या यह संसद से पारित कानून है?

नहीं, यह संसद से पारित कानून नहीं बल्कि यूजीसी द्वारा यूजीसी एक्ट 1956 के तहत जारी किया गया एक रेगुलेशन है।

Q2: इक्विटी कमेटी का काम क्या होगा?

यह कमेटी एससी, एसटी और ओबीसी छात्रों की शिकायतों को सुनकर निर्धारित समय सीमा में निपटारा करेगी।

Q3: शिकायतों में कितनी बढ़ोतरी हुई है?

यूजीसी के आंकड़ों के अनुसार, पिछले 5 वर्षों में जातिगत भेदभाव की शिकायतों में 118.4% की वृद्धि हुई है।
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