नई दिल्ली: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम, 2026’ (Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026) को लेकर देशभर के शिक्षा संस्थानों और राजनीतिक गलियारों में भारी विवाद छिड़ गया है। 15 जनवरी 2026 से प्रभावी हुए इन नियमों को लेकर दिल्ली स्थित यूजीसी मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन हो रहे हैं और मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है।
क्या यह ‘UGC Bill’ संसद से पारित कानून है?
आम चर्चा में इसे ‘UGC Bill’ कहा जा रहा है, लेकिन तकनीकी रूप से यह संसद द्वारा पारित विधेयक या कानून नहीं है। यह UGC Act 1956 के तहत यूजीसी द्वारा अधिसूचित एक विनियम (Regulation) है।
- अंतर: संसद से पारित कानून के लिए लोकसभा और राज्यसभा में बहस और वोटिंग होती है। इसके विपरीत, यूजीसी के ये नियम वैधानिक निकाय द्वारा मंत्रालय की सहमति से सीधे नोटिफिकेशन के जरिए लागू किए गए हैं।
- दंड की शक्ति: ये नियम आपराधिक सजा या जेल नहीं दे सकते, लेकिन संस्थानों की मान्यता रद्द करने या फंड रोकने जैसी सख्त कार्रवाई का अधिकार रखते हैं।
UGC के नए नियम 2026 की मुख्य बातें
यूजीसी ने इन नियमों को परिसरों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए लागू किया है। इसके प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं:
- इक्विटी कमेटी (Equity Committee): हर यूनिवर्सिटी और कॉलेज में एक कमेटी बनाना अनिवार्य है जो एससी, एसटी और ओबीसी छात्रों की शिकायतों का निपटारा करेगी।
- शिकायत तंत्र: संस्थानों को ‘इक्वल अपॉर्चुनिटी सेंटर’, ‘इक्विटी स्क्वाड’ और 24×7 हेल्पलाइन स्थापित करनी होगी।
- समयबद्ध निवारण: शिकायतों का निपटारा एक निश्चित समय सीमा के भीतर करना होगा।
- जवाबदेही: संस्थान के प्रमुख सीधे तौर पर इन नियमों के कार्यान्वयन के लिए जिम्मेदार होंगे।
विरोध का केंद्र: क्यों हो रहा है बवाल?
नियमों के अधिसूचित होते ही सवर्ण (General Category) छात्रों और शिक्षक संगठनों ने मोर्चा खोल दिया है। विरोध के मुख्य कारण ये हैं:
- एकतरफा परिभाषा: ‘जातिगत भेदभाव’ की परिभाषा (Rule 3c) केवल आरक्षित वर्गों (SC/ST/OBC) तक सीमित है। सवर्ण छात्रों का तर्क है कि वे भी भेदभाव का शिकार हो सकते हैं, लेकिन नियमों में उनके लिए कोई सुरक्षा नहीं है।
- दुरुपयोग का डर: नए नियमों से ‘झूठी शिकायतों पर सजा’ का प्रावधान हटा दिया गया है। प्रदर्शनकारियों को डर है कि इससे सवर्ण छात्रों को फंसाने के लिए नियमों का गलत इस्तेमाल हो सकता है।
- प्रशासनिक इस्तीफा: बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने इन नियमों को ‘भेदभावपूर्ण’ बताते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया है।
सुप्रीम कोर्ट में याचिका और कानूनी चुनौती
एडवोकेट विनीत जिंदल और मृत्युंजय तिवारी द्वारा सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की गई हैं।
- याचिका की मांग: भेदभाव की परिभाषा को ‘Caste-Neutral’ (जाति-निरपेक्ष) बनाया जाए ताकि सुरक्षा सभी को मिले, चाहे उनकी जाति कोई भी हो।
- संवैधानिक तर्क: याचिकाकर्ताओं का दावा है कि ये नियम संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), 15(1) और 21 का उल्लंघन करते हैं।
सरकार और यूजीसी का पक्ष
यूजीसी का कहना है कि पिछले 5 वर्षों में आरक्षित वर्गों के खिलाफ भेदभाव की शिकायतों में 118.4% की बढ़ोतरी हुई है, जिसके कारण ये सख्त नियम जरूरी थे। वहीं, सरकारी सूत्रों के अनुसार, मंत्रालय जल्द ही इस पर स्पष्टीकरण जारी करेगा ताकि फैले हुए भ्रम को दूर किया जा सके और यह सुनिश्चित किया जा सके कि नियमों का दुरुपयोग न हो।
फिलहाल, सोशल मीडिया पर #RollbackUGC ट्रेंड कर रहा है और छात्र संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि नियमों में संशोधन नहीं हुआ तो आंदोलन और तेज किया जाएगा।

